| کـنون شيرين بار بد گوش دار |
| سر مـهـتران رابـه آغوش دار |
| چو آگاه شد بار بد زانـک شاه |
| بـه پرداخت بي داد و بيکام گاه |
| ز جـهرم بيامد سوي طيسـفون |
| پر از آب مژگان و دل پر ز خون |
| بيامد بدان خانـه او را بديد |
| شده لعـل رخـسار او شنبـليد |
| زماني هـميبود در پيش شاه |
| خروشان بيامد سوي بارگاه |
| هـمي پـهـلواني برو مويه کرد |
| دو رخـساره زرد و دلي پر ز درد |
| چـنان بد که زاريش بشنيد شاه |
| هـمان کس کجا داشت او را نگاه |
| نگهـبان کـه بودند گريان شدند |
| چو بر آتـش مـهر بريان شدند |
| هـميگـفـت الايا ردا خسروا |
| بزرگاسـترگاتـن آور گوا |
| کجات آن همه بزرگي و آن دستگاه |
| کـجات آن همه فرو تخت وکـلاه |
| کـجات آن هـمـه برز وبالا وتاج |
| کـجات آن همه ياره وتخـت عاج |
| کـجات آن همه مردي و زور و فر |
| جـهان راهـميداشـتي زير پر |
| کـجا آن شبستان و رامشـگران |
| کـجا آن بر و بارگاه سران |
| کـجا افـسر و کاوياني درفـش |
| کـجا آن همـه تيغهاي بنفـش |
| کـجا آن دليران جـنـگ آوران |
| کـجا آن رد و موبد و مـهـتران |
| کـجا آن همه بزم وساز شـکار |
| کـجا آن خراميدن کارزار |
| کـجا آن غـلامان زرين کـمر |
| کـجا آن هـمـه راي وآيين وفر |
| کـجا آن سرافراز جان و سـپار |
| کـه با تخـت زر بود و با گوشوار |
| کـجا آن همه لشـکر و بوم و بر |
| کـجا آن سرافرازي و تـخـت زر |
| کـجا آن سرخود و زرين زره |
| ز گوهر فـگـنده گره بر گره |
| کـجا اسـپ شبديز و زرين رکيب |
| کـه زير تو اندر بدي ناشـکيب |
| کـجا آن سواران زرين سـتام |
| کـه دشمـن بدي تيغشان رانيام |
| کـجا آن همـه رازوان بـخردي |
| کـجا آن هـمـه فره ايزدي |
| کـجا آن همه بخشـش روز بزم |
| کـجا آن همه کوشـش روز رزم |
| کـجا آن همـه راهوار اسـتران |
| عـماري زرين و فرمانـبران |
| هيونان و بالا وپيل سـپيد |
| همـه گشـتـه از جان تو نااميد |
| کـجاآن سخنـها به شيرين زبان |
| کـجا آن دل و راي و روشن روان |
| ز هر چيز تـنـها چرا ماندي |
| ز دفـتر چـنين روز کي خواندي |
| مـبادا که گستاخ باشي به دهر |
| کـه زهرش فزون آمد از پاي زهر |
| پـسر خواستي تابود يار و پشت |
| کـنون از پسر رنجت آمد به مشت |
| ز فرزند شاهان بـه نيرو شوند |
| ز رنـج زمانـه بي آهو شوند |
| شهنـشاه را چونک نيرو بکاست |
| چو بالاي فرزند او گشت راسـت |
| هر آنکس که او کار خسرو شـنود |
| بـه گيتي نـبايدش گسـتاخ بود |
| هـمـه بوم ايران تو ويران شمر |
| کـنام پلـنـگان و شيران شمر |
| سر تـخـم ساسانيان بود شاه |
| کـه چون اونـبيند دگر تاج و گاه |
| شد اين تخمه ويران و ايران همان |
| برآمد هـمـه کامـه بدگـمان |
| فزون زين نباشد کسي را سـپاه |
| ز لـشـکر کـه آمدش فريادخواه |
| گزند آمد از پاسـبان بزرگ |
| کـنون اندر آيد سوي رخنـه گرگ |
| نـباشد سـپاه تو هـم پايدار |
| چو برخيزد از چار سو کار زار |
| روان تو را دادگر يار باد |
| سر بد سـگالان نـگونـسار باد |
| بـه يزدان و نام تو اي شـهريار |
| بـه نوروز و مهر و بـخرم بـهار |
| که گر دست من زين سپس نيز رود |
| بـسايد مـبادا بـه من بر درود |
| بـسوزم همـه آلـت خويش را |
| بدان تا نـبينـم بدانديش را |
| بـبريد هر چارانگـشـت خويش |
| بريده هميداشت در مشت خويش |
| چو در خانه شد آتشي بر فروخت |
| همـه آلت خويش يکسر بسوخت |