| کـنون زين سپس هفتخوان آورم |
| سـخـنـهاي نـغز و جوان آورم |
| اگر بـخـت يکـباره ياري کـند |
| برو طبـع مـن کامـگاري کـند |
| بـگويم بـه تایید محـمود شاه |
| بدان فر و آن خـسرواني کـلاه |
| کـه شاه جـهان جاودان زنده باد |
| بزرگان گيتي ورا بـنده باد |
| چو خورشيد بر چرخ بنـمود چـهر |
| بياراسـت روي زمين را به مـهر |
| بـه برج حمـل تاج بر سر نـهاد |
| ازو خاور و باخـتر گـشـت شاد |
| پر از غلغـل و رعد شد کوهـسار |
| پر از نرگـس و لالـه شد جويبار |
| ز لالـه فريب و ز نرگـس نـهيب |
| ز سنبـل عـتاب و ز گلـنار زيب |
| پر آتـش دل ابر و پر آب چـشـم |
| خروش مـغاني و پرتاب خشـم |
| چو آتـش نـمايد بـپالايد آب |
| ز آواز او سر برآيد ز خواب |
| چو بيدار گردي جـهان را بـبين |
| که ديباست گر نقش ماني به چين |
| چو رخشنده گردد جهان ز آفـتاب |
| رخ نرگـس و لالـه بيني پر آب |
| بخـندد بدو گويد اي شوخ چشم |
| به عشق تو گريان نه از درد و خشم |
| نـخـندد زمين تا نـگريد هوا |
| هوا را نـخوانـم کـف پادشا |
| کـه باران او در بـهاران بود |
| نـه چون همـت شـهرياران بود |
| به خورشيد ماند همي دست شاه |
| چو اندر حـمـل برفرازد کـلاه |
| اگر گنج پيش آيد از خاک خشـک |
| وگر آب دريا و گر در و مـشـک |
| ندارد هـمي روشـناييش باز |
| ز درويش وز شاه گردن فراز |
| کـف شاه ابوالقاسـم آن پادشا |
| چـنين اسـت با پاک و ناپارسا |
| دريغـش نيايد ز بـخـشيدن ايچ |
| نـه آرام گيرد بـه روز بـسيچ |
| چو جنگ آيدش پيش جنـگ آورد |
| سر شـهرياران بـه چنـگ آورد |
| بدان کس که گردن نهد گنج خويش |
| ببـخـشد نينديشد از رنج خويش |
| جـهان را جـهاندار محـمود باد |
| ازو بـخـشـش و داد موجود باد |
| ز رويين دژ اکـنون جـهانديده پير |
| نـگر تا چـه گويد ازو ياد گير |